Yayati by V S Khandekar | Book Review (Hindi)

श्री विष्णु सखाराम खांडेकर द्वारा मराठी भाषा में रचित ‘ययाति’ (Yayati) का प्रकाशन 1959 में हुआ था । इस उपन्यास में लेखक ने चंद्रवंशी राजा नहुष के पुत्र, राजा ययाति के जीवन को वर्तमान समय के परिपेक्ष्य में देखते हुए समाज को आईना दिखाने का प्रयत्न किया है । इस उपन्यास को 1960 में ज्ञानपीठ और 1974 में साहित्य अकादमी पुरस्कारों से नवाजा गया है।

प्रसंग अवश्य ही पौराणिक कथा से उठाया गया है परंतु लेखक की चित्रण शैली आपको सोचने पर विवश कर देगी कि ‘ययाति’ तो आज हर आदमी बन चुका है। खांडेकर जी ने रचना में कल्पना के अंश भी पिरोए हैं इसलिए इस उपन्यास को पढ़ना और जरूरी हो जाता है कि इसमें ऐसा नया क्या है जो हमें नहीं पता। तो आइए पता करते हैं।

प्रेरणा (Inspiration / The Impulse​)

मुझे ठीक से तो याद नहीं कब, परंतु शायद जिन दिनों दूरदर्शन में महाभारत का प्रसारण होता था, उन्हीं दिनों मैंने अखबार में ‘ययाति’ का कोई प्रसंग पढ़ा था। ज्यादा कुछ तो याद नहीं पर मेरे मन में यह कथा घर कर गई थी – राजा ययाति के एक पुत्र पुरु ने अपना यौवन उन्हें देखकर उनकी वृद्धावस्था स्वयं ले ली थी। ययाति को ऋषि शुक्राचार्य के श्राप के कारण अपना यौवन गंवाना पड़ा था। अपने पुत्र पुरु से ययाति ने 1000 वर्षों का यौवन प्राप्त किया था और बदले में पुरु को 1000 वर्षों की वृद्धावस्था मिली थी। मेरे मन में यह प्रश्न था कि ययाति ऐसा कैसा पिता था जो अपने स्वार्थ के लिए अपने ही पुत्र का यौवन लेने से भी नहीं हिचकिचाया। तभी से ये नाम ‘ययाति’ मेरे मन में बैठा हुआ है। फिर जब सौभाग्य से श्री विष्णु सखाराम खांडेकर जी द्वारा रचित उपन्यास ‘ययाति’ पढ़ने का मौका मिला तो मैंने इसे नहीं गंवाया। हालांकि इस उपन्यास में मूल कथा से हटकर के एक ज़रा अलग सी कथा पिरोयी गयी है, फिर भी ‘ययाति’ को जानने की इच्छा ने मुझे इसे पढ़ने के लिए प्रेरित किया।

कथात्मक हुक (The Hook)

नशे में धुत सारथी के हाथों से लगाम छूट जाती है । घोड़े बेकाबू होकर मनमानी दिशा में भाग खड़े होते हैं । रथ गहरी खाई में गिर कर चकनाचूर हो जाता है और उसमे बैठा धनुर्धर व्यर्थ प्राणों से हाथ धो बैठता है।

कथानक (Synopsis) - Yayati

‘ययाति’ (Yayati) उपन्यास का मूल प्रसंग महाभारत के आदि पर्व के यायतोपाख्यान से लिया गया है। लेखक ने इस मूल प्रसंग में अनेकों आयाम जोड़े और कल्पना शक्ति का भी सहारा लिया ताकि इसे वर्तमान समय के अनुसार प्रासंगिग बनाया जा सके। मूलतः यह एक दैहिक और भौतिक लालसाओं के पीछे भागते राजा की कहानी है जिसकी तृष्णा कभी तृप्त न हो पाती थी। इस कथा में लेखक ने मुख्य पात्रों के मन में नीतिसंगत आयामों पर निरंतर चल रहे द्वंद्व को बड़ी शालीनता से दर्शाया है।

उपन्यास के तीन सूत्रधार हैं जो अपनी-अपनी गाथा सुनाते हैं। लेखक ने एक ही घटना को तीनों के दृष्टिकोण से अलग-अलग बतलाया है। सबसे प्रमुख पात्र है, ‘ययाति’ जो कि हस्तिनापुर के राजा और चंद्रवंशी राजा नहुष के पुत्र हैं। इनके एक बड़े भाई थे यति, जो कि भौतिक लालसाओं से दूर थे और महल छोड़ कर जा चुके थे।  बाकी मुख्य पात्र हैं – असुरों के गुरु शुक्राचार्य, उनकी पुत्री देवयानी; असुर नरेश वृषपर्वा और उनकी पुत्री शर्मिष्ठा। शर्मिष्ठा और देवयानी बचपन की साखियाँ थी।  एक और पात्र है ऋषि कुमार कच, देवताओं के गुरु बृहस्पति का पुत्र, जो कि ययाति का मित्र और देवयानी का आकर्षण या प्रेम था। ययाति और शर्मिष्ठा के पुत्र पुरु की भी विशेष भूमिका है कहानी में। आइए कथा को गति देते हैं –

ययाति का आरंभिक जीवन इतना सहज नहीं रहा जितना कि राजकुमारों का होता है।  बहुत कम उम्र में उसे पता चला कि उसे एक क्षुद्र दासी का दूध पिलाया गया क्योंकि उसकी माँ को अपने सौंदर्य के मुर्झाने की चिंता अधिक थी।  उसे अपनी माँ स्वार्थी जान पड़ी थी। उसे लगा कि उसे उसके अधिकार से वंचित रखा गया जिस कारण उसका मातृत्व से मोहभंग हो गया था।  फिर जब उसके पिता की मृत्यु हुई तो वह काफी विचलित हो गया और मृत्यु रूपी सत्य से उसे भय होने लगा।  ऐसे दुर्बल समय में वह अपना दुःख, भय और विवशता भुलाने के लिए नैतिक पतन की ओर अग्रसर हो गया और भोग-विलास में डूब गया। यद्यपि अपनी इस दुर्बलता पर उसे खेद भी होता परंतु वह अपनी कामनाओं के हाथों विवश था।  उसे महलों में सुख नहीं मिलता था पर उसके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था।

इसी बीच वह अपने बड़े भाई यति से भी मिला जिससे उसे ये पता चला कि उनके पिता पर कोई श्राप था कि उनकी संताने कभी सुखी नहीं होंगी। और इसी कारण यति घर से भाग निकला था, एक दुखी राजपुत्र की अपेक्षा एक सुखी सन्यासी बनने। 

कहानी में आगे ‘ययाति’ का मिलना ऋषि पुत्र कच से होता है और इनकी मित्रता हो जाती है। कच को देवताओं की तरफ से गुरु शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या प्राप्त करने भेजा जाता है। गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी ऋषि कुमार कच की ओर आकर्षित हो गई परंतु कच  ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया। देवयानी, इससे अत्यंत क्रोधित हो गई। फिर कुछ ऐसा घटा कि ययाति और देवयानी का विवाह हो गया और असुर कुमारी शर्मिष्ठा, देवयानी की दासी बनकर उनके महल में आ गई। अब ये घटना इस उपन्यास का एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

आखिर ऐसा क्या घटा कि असुर नरेश की पुत्री को अपनी सखी की दासी बनना पड़ा? पुरु का जन्म कैसे हुआ? किसने और क्यों वो श्राप दिया था जिसके कारण ययाति विचलित था? गुरु शुक्राचार्य से भी ययाति को एक और श्राप मिल गया था, वह क्या था और उसके पीछे क्या कारण थे? क्या ययाति की तृष्णा को कभी तृप्ति मिल पाई? इन सभी प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए आपको यह उपन्यास पढ़ना होगा।

मुख्य विचार (Takeaways)

न जातु कामः कामानुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥       

जैसे अग्नि में घी डालने से वह अधिक प्रज्वलित होती है, वैसे ही भोग भोगने से कामना शांत नहीं होती, उल्टे प्रज्वलित होती है।

श्रीमद् भगवत गीता के इस श्लोक से ही लेखक ने उपन्यास की समाप्ति की है और मेरी दृष्टि में यही सबसे बड़ी शिक्षा है जो हमें ‘ययाति’ से मिलती है।

क्या पसंद आया (What I liked)

‘ययाति’ (Yayati) जैसे उपन्यास बार-बार नहीं रचे जाते हैं। अत्यंत प्रभावशाली लेखन, उचित गति, सटीक शब्दों का प्रयोग और उपन्यास का सहज प्रवाह – ये सब एक रचनाकार का ही कौशल कहलायेगा। श्री खांडेकर जी को कोटि-कोटि साधुवाद।        

एक पौराणिक प्रसंग में कैसे उन्होंने कल्पना और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण जोड़ते हुए, ‘ययाति’ जैसी सुंदर रचना रची। पढ़ कर ऐसा लगा मानो लेखक ने ‘ययाति’ को आज के समय में प्रत्यक्ष ला खड़ा कर दिया है क्योंकि आज का इंसान एक तरह से ययाति ही तो है जो अपनी तृष्णा  बुझाने के लिए भागता जा रहा है और तृष्णा मिट नहीं रही है बल्कि बढ़ती जा रही है।

‘ययाति’ उपन्यास की जो बात मुझे सबसे अच्छी लगी वह यह है कि कहानी तो चल रही है पर कहानी के साथ-साथ लेखक ने हर घटना या उसके परिणामों के तर्कसंगत होने या नहीं होने का जो चिंतन पात्रों के अंतर्मन  में चल रहा है, उसका बड़ा ही प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण किया है। साथ ही एक ही घटना को अलग-अलग पात्रों के अलग-अलग दृष्टिकोणों से दर्शाया गया है। अगर ययाति अपनी कथा सुना रहा है तो वो किसी घटना पर जो प्रतिक्रिया दे रहा है; उस समय उसके मन में जो – जो भाव या तर्क आ रहे हैं, वह सब लेखक ने विस्तार से दर्शाया है। 

इस उपन्यास में लेखक ने मानव मन में उठने वाले लगभग सभी भावों का सुंदरतम चित्रण किया है। ययाति के मन में उठने वाले भय, क्षोभ, संताप, हीन भावना, पीड़ा, वासना, प्रेम, व्याकुलता, स्वार्थ, लोभ और पराजय के भावों का विस्तृत चित्रण आपके मन को अवश्य छुएगा ।

विभिन्न पात्रों के विभिन्न व्यक्तित्व, जो कि कई बार अत्यंत नाटकीय ढंग से परिवर्तित हो जाते हैं, यह दर्शाता है कि मानव कितना जटिल प्राणी है। लेखक ने बड़ी सहजता से इसे उकेरा है। कहानी पढ़ते हुए कई बार हमारे मन में भी ऐसे ही तर्क और भाव उत्पन्न होने लगते हैं। मेरे विचार से लेखक ने तीनों मुख्य पात्रों की भावनाओं का श्रेष्ठ चित्रण किया है और तीनों के चरित्र के साथ न्याय किया है। 

मानसिक अंतर्द्वंद के कुशल चित्रण और भावना की सटीक अभिव्यक्ति ने इस उपन्यास को एक सरल कथा से हटकर एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण भी प्रदान किया है जो कि ‘ययाति’ को निराला बनाता है।

क्या पसंद नहीं आया (What I didn't like)

‘ययाति’ (Yayati) बिना संशय एक सुंदर रचना है परंतु पढ़ते समय मुझे में  निरंतर एक निराशा का भाव जग रहा था। मुझे कथा के मुख्य पात्रों से लगाव नहीं हो पा रहा था क्योंकि उन्हें रचा ही ऐसा गया है। साधारणतया उपन्यास के किसी न किसी पात्र के प्रति जो लगाव उत्पन्न होता है वही हमें उपन्यास अंत तक पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। ‘ययाति’ में मुझे पात्रों से नहीं बल्कि लेखन से लगाव हो रहा था। ये  श्री विष्णु सखाराम खांडेकर जी की लेखनी का कमाल है जो हमें अंत तक बांधे रखता है। अगर लेखन इतना सधा हुआ न होता तो उपन्यास के साथ न्याय नहीं हो पाता … क्योंकि ‘ययाति’ पात्र से आपको प्रेम नहीं होगा, उसके जैसा तो शायद कोई भी बनना न चाहेगा। अगर गहराई से विवेचन करूं तो यह लेखक की जीत ही है कि हमारे मन में उपन्यास पढ़कर यही भाव आता है कि ‘ऐसा’ हमें नहीं करना है। जबकि सत्य ये है कि ऐसा ही हम सब करते हैं अपने जीवन में – तृष्णा तृप्त करने में लगे हुए हैं बस। कहीं बल की तृष्णा, कहीं धन की तृष्णा, कहीं नाम की तृष्णा।  सब लगे हुए हैं … तृष्णा के तृप्ति में।  इसका अंत कहाँ है … किसी को नहीं पता।

अनुशंसा (Recommendation) - Yayati

5/5

मेरे विचार से ‘ययाति’ (Yayati) को अवश्य पढ़ना चाहिए। कथा भले ही पौराणिक हो परंतु आज के समय में भी यह प्रसंग उतना ही सटीक बैठता है। पात्रों के मनोभावों और घटना के प्रति उनके विभिन्न दृष्टिकोणों का अतुलनीय चित्रण हुआ है। अतः ‘ययाति’ को पढ़कर कुछ हद तक तो हम समझ पाएंगे कि जीवन में हमें क्या नहीं करना है। 

Yayati by Vishnu S. Khandekar
Genre: Fiction
Length: 336 pages

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